श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.28.12 
अहोरात्रं च संतोष: कर्तव्यो नियतात्मना।
फलैर्वृक्षावपतितै: सीते दु:खमतो वनम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
सीता! वहाँ तो मन को वश में रखना पड़ता है और दिन-रात वृक्षों से गिरने वाले फलों को खाकर ही संतुष्ट रहना पड़ता है। इसलिए वन दुःखों का स्थान है।
 
Sita! There one has to control one's mind and be satisfied with eating only the fruits that fall from the trees day and night. Therefore, the forest is a place of suffering.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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