श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.28.11 
सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले।
रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्माद् दु:खमतो वनम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'दिनभर के परिश्रम से थका हुआ मनुष्य रात में भूमि पर गिरे हुए सूखे पत्तों की शय्या पर सोता है; इसलिए वन दुःख से भरा हुआ है ॥11॥
 
'A man, tired from the day's labour, has to sleep at night on a bed of dry leaves that have fallen on the ground by themselves; hence the forest is full of misery. ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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