श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 27: सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.27.7 
यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव।
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! यदि आज आप दुर्गम वन की ओर प्रस्थान करेंगे, तो मैं मार्ग में कुशा और काँटों को रौंदता हुआ आपके आगे-आगे चलूँगा।
 
'Raghunandan! If you are setting out towards the inaccessible forest today, I will go ahead of you, trampling the kusha grass and thorns on the way.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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