श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 27: सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.27.5 
भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे महात्मन! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है, इसलिए मुझे आपके साथ वन में रहने की अनुमति दी गई है ॥5॥
 
'O great man! Only a wife follows the destiny of her husband, therefore I have been given permission to stay in the forest along with you. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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