श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 27: सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.27.23 
अनन्यभावामनुरक्तचेतसं
त्वया वियुक्तां मरणाय निश्चिताम्।
नयस्व मां साधु कुरुष्व याचनां
नातो मया ते गुरुता भविष्यति॥ २३॥
 
 
अनुवाद
मेरे हृदय का सारा प्रेम केवल आपको ही समर्पित है, मेरा मन आपके अतिरिक्त अन्यत्र नहीं जाता, यदि मैं आपसे वियोग में हूँ तो मेरी मृत्यु अवश्य हो जाएगी। अतः आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें, मुझे अपने साथ ले चलें, अच्छा होगा; मेरी उपस्थिति आपके लिए भार नहीं होगी।॥23॥
 
‘All the love of my heart is dedicated to you alone, my mind does not go anywhere else except you, if I am separated from you then I will surely die. Therefore, please accept my request, take me with you, it will be good; my presence will not be a burden on you.’॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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