| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 27: सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना » श्लोक 17-18h |
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| | | | श्लोक 2.27.17-18h  | अग्रतस्ते गमिष्यामि भोक्ष्ये भुक्तवति त्वयि।
इच्छामि परत: शैलान् पल्वलानि सरांसि च॥ १७॥
द्रष्टुं सर्वत्र निर्भीता त्वया नाथेन धीमता। | | | | | | अनुवाद | | मैं आपके आगे चलकर आपके भोजन करने के बाद जो कुछ बच जाएगा, उसे खा लूँगा। प्रभु! हे बुद्धिमान प्राणनाथ, आपके साथ निर्भय होकर वन में घूमने तथा पर्वतों, छोटे-छोटे तालाबों और सरोवरों को देखने की मेरी बड़ी इच्छा है।॥17 1/2॥ | | | | ‘I will go ahead of you and eat whatever is left after you have finished eating. Prabhu! I have a great desire to roam around the forest fearlessly with you, the wise Prananath, and see the mountains, small ponds and lakes.॥ 17 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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