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श्लोक 2.27.14  |
त्वं हि कर्तुं वने शक्तो राम सम्परिपालनम्।
अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनर्मम मानद॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| हे दूसरों को सम्मान देने वाले श्री राम! आप वन में रहकर भी दूसरों की रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिए कौन सी बड़ी बात है?॥ 14॥ |
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| 'O Shri Ram who gives respect to others! You can protect others even while staying in the forest, then what is a big deal for you to protect me?॥ 14॥ |
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