श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 27: सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.27.13 
शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी।
सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धिषु॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'वीर! मैं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहूँगा तथा आपके साथ मधुर सुगन्ध से परिपूर्ण वनों में विचरण करूँगा॥13॥
 
'Valiant! I will follow the celibacy vow and remain always ready to serve you and roam with you in the forests filled with sweet fragrance.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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