श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 27: सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.27.12 
सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितु:।
अचिन्तयन्ती त्रीँल्लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'जैसे मैं अपने पिता के घर में रहती थी, वैसे ही उस वन में भी सुखपूर्वक रहूँगी। वहाँ तीनों लोकों के ऐश्वर्य की कुछ भी परवाह न करके, अपने पतिव्रता धर्म का ध्यान करती हुई, सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहूँगी।॥ 12॥
 
'Just as I lived in my father's house, I will live happily in that forest as well. There, without considering the opulence of the three worlds as anything, I will always be engaged in serving you, thinking about the duty of being faithful to my husband.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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