श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  2.25.9-10 
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा।
ऋतव: षट् च ते सर्वे मासा: संवत्सरा: क्षपा:॥ ९॥
दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा।
श्रुति: स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वत:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र आदि जगत के सभी रक्षक, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और शुभ काल, ये सब मिलकर तुम्हारा सदैव कल्याण करें। पुत्र! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें॥ 9-10॥
 
May all the protectors of the world like Indra, the six seasons, all months, Samvatsara, nights, days and auspicious times always bless you. Son! May Shruti, Smriti and Dharma also protect you from all sides.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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