श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.25.45 
मयार्चिता देवगणा: शिवादयो
महर्षयो भूतगणा: सुरोरगा:।
अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते
हितानि कांक्षन्तु दिशश्च राघव॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
'रघुनन्दन! जिनकी मैंने सदैव पूजा और आदर किया है, वे शिवजी जैसे देवता, महर्षि, भूत, नाग आदि देवता और सम्पूर्ण दिशाएँ - वे सब वन में जाते हुए भी दीर्घकाल तक आपके कल्याण की कामना करते रहें।'॥ 45॥
 
'Raghunandan! Those whom I have always worshipped and respected, the gods like Shiva, the great sages, the ghosts, the serpents like gods and all the directions - may all of them, when they go to the forest, continue to wish for your welfare for a long time.'॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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