श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.25.44 
मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागत:।
वध्वाश्च मम नित्यं त्वं कामान् संवर्ध याहि भो:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
अब तुम वनवास से लौटकर राजा के योग्य शुभ वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर यहाँ आओ और मेरी पुत्रवधू सीता की समस्त इच्छाएँ सदैव पूर्ण करो॥ 44॥
 
‘Now go and return here from your exile, adorned with the auspicious clothes and ornaments befitting a king, and you should always fulfill all the desires of my daughter-in-law, Sita.॥ 44॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas