श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.25.42 
प्रणष्टदु:खसंकल्पा हर्षविद्योतितानना।
द्रक्ष्यामि त्वां वनात् प्राप्तं पूर्णचन्द्रमिवोदितम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
'उस समय मेरे दुःख भरे विचार लुप्त हो जायेंगे, मेरा मुख प्रसन्नता से भर जायेगा और मैं तुम्हें वन से आते हुए देखूंगी, जैसे पूर्णिमा की रात को पूर्ण चन्द्रमा उदित होता है।
 
'At that time my sorrowful thoughts will vanish, my face will be filled with joy and I will see you coming from the forest like the full moon rising on a full moon night.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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