श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.25.4 
येभ्य: प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च।
ते च त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभि:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र! जिन देवताओं को तुम पूजा-स्थानों और मन्दिरों में पूजते हो, वे सभी देवता तथा महर्षिगण वन में तुम्हारी रक्षा करें।
 
'Son! May all the gods whom you pay respects at places of worship and temples, along with the great sages, protect you in the forest.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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