श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.25.39 
उवाचापि प्रहृष्टेव सा दु:खवशवर्तिनी।
वाङ्मात्रेण न भावेन वाचा संसज्जमानया॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् शोक से व्याकुल कौशल्या प्रसन्नचित्त होकर स्पष्ट रूप से मंत्र पढ़ने लगीं। उस समय वे केवल वाणी से ही मंत्र पढ़ सकती थीं, हृदय से नहीं (क्योंकि उनका हृदय श्रीराम के वियोग की संभावना से व्यथित था)। वे शोक से रुँधे हुए और लड़खड़ाते हुए स्वर से मंत्र पढ़ रही थीं।
 
Thereafter Kausalya, who was overcome with grief, appeared to be happy and clearly recited the mantras. At that time she could recite the mantras only with her voice, not with her heart (because her heart was distressed at the possibility of separation from Shri Ram). She was reciting the mantras with a voice choked with grief and a faltering voice.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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