श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.25.34 
अमृतोत्पादने दैत्यान् घ्नतो वज्रधरस्य यत्।
अदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'अमृत की उत्पत्ति के समय दैत्यों का नाश करने वाले वज्रधारी इन्द्र को माता अदिति ने जो शुभ आशीर्वाद दिया था, वही आपको भी प्राप्त हो। 34॥
 
'May the same auspicious blessings that Mother Aditi gave to Indra, the thunderer wielder, who destroyed the demons at the time of creation of Amrit, be available to you too. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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