श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.25.33 
यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा।
अमृतं प्रार्थयानस्य तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
'आप भी वही शुभ कार्य प्राप्त करें जो विनता देवी ने पूर्वकाल में अपने पुत्र गरुड़ के लिए किया था, जो अमृत लाने की इच्छा रखते थे।' 33.
 
'May you also receive the same auspiciousness that Vinata Devi performed in the past for her son Garuda who desired to bring nectar.' 33.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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