श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.25.32 
यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते।
वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वृत्रासुर का नाश करने के कारण समस्त देवताओं द्वारा पूजित सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र भी तुम्हें वही शुभ आशीर्वाद दें॥32॥
 
'May the same auspicious blessing be given to you by the thousand-eyed Indra, revered by all the gods, for destroying Vritrasura. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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