श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.25.31 
ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी।
दक्षिणां प्रददौ काम्यां राघवं चेदमब्रवीत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद श्री रामजी की महिमामयी माता ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण पुरोहित को उनकी इच्छानुसार दक्षिणा दी और श्री रघुनाथजी से इस प्रकार कहा-॥31॥
 
After this, the glorious mother of Shri Ram gave dakshina to that great Brahmin priest according to his wish and said to Shri Raghunathji thus -॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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