| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना » श्लोक 30 |
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| | | | श्लोक 2.25.30  | मधुदध्यक्षतघृतै: स्वस्तिवाच्यं द्विजांस्तत:।
वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम्॥ ३०॥ | | | | | | अनुवाद | | तत्पश्चात, स्वस्तिवाचन के उद्देश्य से ब्राह्मणों को मधु, दही, अक्षत और घी का दान देकर, कौसल्या जी ने उन सबको स्वस्तिवाचन सम्बन्धी मन्त्र सुनाने को कहा, इस कामना के साथ कि ‘वन में श्री रामजी का सदैव कल्याण हो’॥30॥ | | | | Thereafter, for the purpose of reciting Swasthya, after offering honey, curd, Akshat and ghee to the Brahmins, Kausalya ji made them all recite the mantras related to Swasthya with the wish that 'May Shri Ram always be blessed in the forest'. 30॥ | | ✨ ai-generated | | |
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