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श्लोक 2.25.3  |
यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।
स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| 'रघुकुलसिंह! जिस धर्म का तुम नियमित रूप से पालन करते हो, वह सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे॥ 3॥ |
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| 'Raghukulsingh! May the Dharma which you follow regularly and happily protect you from all sides.॥ 3॥ |
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