श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.25.3 
यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।
स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'रघुकुलसिंह! जिस धर्म का तुम नियमित रूप से पालन करते हो, वह सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे॥ 3॥
 
'Raghukulsingh! May the Dharma which you follow regularly and happily protect you from all sides.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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