श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.25.22 
स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्य: पार्थिवेभ्य: पुन: पुन:।
सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये च ते परिपन्थिन:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘आकाश में उड़नेवाले प्राणियों से, पृथ्वी पर रहनेवाले प्राणियों से, सम्पूर्ण देवताओं से तथा अपने शत्रुओं से भी तुम्हारा सदैव कल्याण हो॥ 22॥
 
‘May you always receive welfare from the creatures flying in the sky, from the creatures living on the earth, from all the gods as well as from your enemies.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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