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श्लोक 2.25.2  |
न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम।
शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| (इसके बाद उसने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा-) 'रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें नहीं रोक सकती। अब जाओ, धर्म के मार्ग पर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ।॥ 2॥ |
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| (After this she blessed him saying-) 'Raghukulabhushan! Now I cannot stop you. Go now, stay on the path of the virtuous and return from the forest soon.॥ 2॥ |
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