श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  2.25.2 
न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम।
शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे॥ २॥
 
 
अनुवाद
(इसके बाद उसने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा-) 'रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें नहीं रोक सकती। अब जाओ, धर्म के मार्ग पर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ।॥ 2॥
 
(After this she blessed him saying-) 'Raghukulabhushan! Now I cannot stop you. Go now, stay on the path of the virtuous and return from the forest soon.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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