श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.25.18 
प्लवगा वृश्चिका दंशा मशकाश्चैव कानने।
सरीसृपाश्च कीटाश्च मा भूवन् गहने तव॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘उस घने वन में जो मेंढक, बंदर, बिच्छू, मक्खी, मच्छर, पहाड़ी सर्प और वन में रहने वाले कीड़े-मकोड़े हैं, वे तुम्हारे प्रति हिंसा न करें।॥18॥
 
‘The frogs or monkeys, scorpions, flies, mosquitoes, mountain serpents and insects that live in the forest should not be violent towards you in that dense forest.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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