श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.25.16 
महावनेऽपि चरतो मुनिवेषस्य धीमत:।
तथा देवाश्च दैत्याश्च भवन्तु सुखदा: सदा॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'उस विशाल वन में साधु वेश में विचरण करते हुए आपके बुद्धिमान पुत्र पर समस्त देवता और दानव सदैव प्रसन्न रहें। 16॥
 
'May all the gods and demons always be pleasant to your intelligent son while wandering in that vast forest in the guise of a monk. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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