श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.25.15 
ऋतवश्चापि षट् चान्ये मासा: संवत्सरास्तथा।
कलाश्च काष्ठाश्च तथा तव शर्म दिशन्तु ते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘छहों ऋतुएँ, विभिन्न मास, संवत्सर, काल और वन- ये सब तुम्हारा कल्याण करें॥ 15॥
 
‘May the six seasons, the various months, the Samvatsara, the Kala (period of time) and the wood – all of these grant you welfare.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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