श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  2.25.13-14 
शैला: सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च।
द्यौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्च सचराचर:॥ १३॥
नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सह दैवतै:।
अहोरात्रे तथा संध्ये पान्तु त्वां वनमाश्रितम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
‘समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, आकाश, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, वायु, जड़-चेतन प्राणी, समस्त तारे, देवताओं सहित ग्रह, दिन-रात तथा दोनों संध्याएँ – ये सब वन में जाते समय तुम्हारी सदैव रक्षा करें।॥13-14॥
 
‘All the mountains, the oceans, King Varuna, the heavens, the space, the earth, the air, the animate and inanimate creatures, all the stars, the planets along with the gods, the day and the night and the two evenings – may all of them always protect you when you go to the forest.॥ 13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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