श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 25: कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गल कामना पूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.25.12 
ते चापि सर्वत: सिद्धा दिशश्च सदिगीश्वरा:।
स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्वां पुत्र नित्यश:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र! वे विख्यात सिद्ध, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी प्रार्थना से प्रसन्न हों और उस वन में सब ओर से तुम्हारी सदैव रक्षा करें॥ 12॥
 
'Son! May those renowned Siddhas, directions and Dikpal (guardians of the directions) be pleased with my prayers and may they always protect you from all sides in that forest.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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