| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 24: कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना , श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना » श्लोक 6-8 |
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| | | | श्लोक 2.24.6-8  | अयं तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारुत:।
विलापदु:खसमिधो रुदिताश्रुहुताहुति:॥ ६॥
चिन्ताबाष्पमहाधूमस्तवागमनचिन्तज:।
कर्शयित्वाधिकं पुत्र नि:श्वासायाससम्भव:॥ ७॥
त्वया विहीनामिह मां शोकाग्निरतुलो महान्।
प्रधक्ष्यति यथा कक्ष्यं चित्रभानुर्हिमात्यये॥ ८॥ | | | | | | अनुवाद | | 'परन्तु पुत्र! तुमसे वियोग होने पर दुःख की वह अतुलनीय एवं प्रचण्ड अग्नि मुझे उसी प्रकार भस्म कर देगी, जैसे ग्रीष्म ऋतु में दावानल सूखी लकड़ी और घास को जला देता है। यह दुःख की अग्नि मेरे ही मन में प्रकट हुई है। तुम्हारे दर्शन न हो पाने की संभावना ही इस अग्नि को भड़काने वाली वायु है। शोकजनित दुःख ही इसमें ईंधन का काम कर रहा है। रोने से जो आँसू गिरते हैं, वे उसमें अर्पित किए गए घी के समान हैं। चिन्ता से उठने वाली गर्म आहें ही उसका महाधुआँ हैं। दूर देश जाकर तुम कैसे लौटोगे, यह चिन्ता ही इस दुःख की अग्नि को जन्म दे रही है। साँस लेने का प्रयास ही इस अग्नि को प्रतिक्षण बढ़ा रहा है। तुम ही इसे बुझाने वाले जल हो। तुम्हारे बिना यह अग्नि मुझे और अधिक सुखाकर जला देगी।' 6-8। | | | | ‘But son! After being separated from you, the incomparable and enormous fire of grief will burn me to ashes just like a forest fire burns dry wood and hay in summer. This fire of grief has appeared in my own mind. The possibility of not being able to see you is the wind that is fanning this fire. The sorrow caused by mourning is acting as fuel for it. The tears that fall from crying are like the ghee offered to it. The hot sighs that arise due to worry are its great smoke. The worry about how you will return after going to a faraway land is giving birth to this fire of grief. The effort to breathe is increasing this fire every moment. You are the water to extinguish it. Without you, this fire will dry me up more and burn me. 6-8. | | ✨ ai-generated | | |
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