विमृज्य बाष्पं परिसान्त्व्य चासकृत्
स लक्ष्मणं राघववंशवर्धन:।
उवाच पित्रोर्वचने व्यवस्थितं
निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथ:॥ ४१॥
अनुवाद
लक्ष्मण के ये वचन सुनकर रघुवंश की वृद्धि करने वाले श्री राम ने उनके आँसू पोंछे और बार-बार उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'सौम्य! मुझे माता-पिता की आज्ञा का पालन करने में दृढ़ समझो। यही सत्पुरुषों का मार्ग है।'॥41॥
After listening to these words of Lakshman, Shri Ram, the one who increases the Raghuvansh, wiped his tears and repeatedly consoled him saying- 'Soumya! Consider me firmly established in obeying the orders of my parents. This is the path of the good men.'॥ 41॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोविंश: सर्ग:॥ २३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥