श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.22.5 
सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रम:।
अभिषेकनिवृत्त्यर्थे सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रम:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रनन्दन! अब तक अभिषेक की सामग्री जुटाने में जो उत्साह तुम्हारा था, उसे इसे रोकने और मेरे वन जाने की तैयारी करने में लगाना चाहिए था।॥5॥
 
'Sumitra Nandan! The enthusiasm you had till now in gathering the materials for the Abhishekam should have been spent in stopping this and making preparations for my departure to the forest.॥ 5॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas