श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.22.28 
अथवा किं मयैतेन राज्यद्रव्यमयेन तु।
उद‍्धृतं मे स्वयं तोयं व्रतादेशं करिष्यति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'अथवा मुझे इस जल के घड़े की क्या आवश्यकता है, जो राज्याभिषेक के लिए शुभ है? मेरे द्वारा अपने हाथों से निकाला गया जल ही मेरी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करने में समर्थ होगा॥ 28॥
 
‘Or what need do I have of this pitcher of water, which is auspicious for the coronation? Only the water drawn by me with my own hands will be effective in fulfilling my vows.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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