श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.22.27 
एभिरेव घटै: सर्वैरभिषेचनसम्भृतै:।
मम लक्ष्मण तापस्ये व्रतस्नानं भविष्यति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! राज्याभिषेक के लिए जो कलश रखे गए हैं, उन्हीं से मैं अपने तप के लिए आवश्यक स्नान कर सकूँगा।॥ 27॥
 
'Lakshmana! With these very pots that have been kept ready for the coronation, I will be able to take the bath necessary for my vow of asceticism.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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