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श्लोक 2.22.25  |
एतया तत्त्वया बुद्धॺा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
व्याहतेऽप्यभिषेके मे परितापो न विद्यते॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| 'इसी तत्त्वबुद्धि के कारण मैंने अपने मन को स्वयं ही स्थिर कर लिया है और अभिषेक में विघ्न पड़ने पर भी मुझे दुःख या व्यथा नहीं होती। ॥25॥ |
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| 'Due to this essential wisdom, I have stabilized my mind on my own and I am not feeling sad or distressed even when my Abhisheka is interrupted. ॥ 25॥ |
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