श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.22.20 
यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते।
व्यक्तं मयि च तस्यां च पतितो हि विपर्यय:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जो कभी सोचा भी नहीं गया, वह भगवान् का विधान है। प्राणियों में अथवा उनके इष्टदेवों में भी ऐसा कोई नहीं है जो भगवान् के विधान को मिटा सके; अतः निश्चय ही उन्हीं की प्रेरणा से मेरे और कैकेयी में यह महान् विप्लव हुआ है (मेरे हाथ का राज्य चला गया है और कैकेयी का मन बदल गया है)॥ 20॥
 
‘That which has never been thought about is the law of God. There is no one among the living beings or even among their presiding deities who can erase the law of God; therefore, it is certainly due to His inspiration that this great upheaval has taken place between me and Kaikeyi (the kingdom that was in my hands has gone away and Kaikeyi's mind has changed).॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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