श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.22.16 
कैकेय्या: प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने।
यदि तस्या न भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'मैं कैकेयी का यह विपरीत व्यवहार ईश्वर की इच्छा समझता हूँ। यदि ऐसा न होता, तो वह मुझे वन में भेजकर कष्ट देने का विचार क्यों करती?' 16.
 
‘I think this opposite attitude of Kaikeyi is the will of God. If it were not so then why would she think of tormenting me by sending me to the forest? 16.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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