श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 22: श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.22.14 
बुद्धि: प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम्।
तं नु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'जिस विधाता ने कैकेयी को ऐसी बुद्धि प्रदान की है और जिसने उसकी इच्छा पूरी करके मुझे वन में भेजने के लिए प्रेरित किया है, उस विधाता को कष्ट देना मेरे लिए उचित नहीं है।॥14॥
 
'It is not right for me to trouble the Creator who has blessed Kaikeyi with such wisdom and who has inspired her to send me to the forest by making her wish come true.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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