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श्लोक 2.22.13  |
मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि।
गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मन: सुखम्॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| 'जब मैं छाल और मृगचर्म धारण करके वन में जाऊँगा और सिर पर जटाएँ बाँधूँगा, तभी कैकेयी का मन प्रसन्न होगा।॥13॥ |
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| 'When I go to the forest wearing bark and deerskin, and tie matted locks on my head, only then will Kaikeyi's mind attain happiness.॥ 13॥ |
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