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श्लोक 2.22.11  |
अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण।
अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमित: पुर:॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| 'लक्ष्मण! इन सब कारणों से मैं अपने राज्याभिषेक का समारोह रोककर शीघ्रातिशीघ्र इस नगर को छोड़कर वन में जाना चाहता हूँ। |
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| 'Lakshmana! For all these reasons, I want to stop the ceremony of my coronation and leave this city for the forest as soon as possible. |
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