श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.21.63 
यशो ह्यहं केवलराज्यकारणा-
न्न पृष्ठत: कर्तुमलं महोदयम्।
अदीर्घकालेन तु देवि जीविते
वृणेऽवरामद्य महीमधर्मत:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
मैं धर्म के पालन से उत्पन्न होने वाले महान यश को, केवल धर्मरहित राज्य के लिए त्याग नहीं सकता। हे माता! जीवन अधिक समय तक नहीं चलने वाला है; इसलिए मैं आज धर्मरहित इस तुच्छ पृथ्वी का राज्य नहीं लेना चाहता। ॥63॥
 
‘I cannot put aside the great fame of following Dharma, which is fruitful, just for a kingdom without Dharma. Mother! Life is not going to last long; therefore, I do not want to take the kingdom of this insignificant earth today without any Dharma.' ॥ 63॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd