श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  2.21.62 
सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं
कुरुष्व न: स्वस्त्ययनानि देवि।
यथा समाप्ते पुनराव्रजेयं
यथा हि सत्येन पुनर्ययाति:॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
अतः हे देवि! आप मुझे वन में जाकर हमारे कल्याण के लिए स्वस्तिवाचन कराने की आज्ञा दीजिए, जिससे वनवास की अवधि समाप्त होने पर मैं पुनः आपकी सेवा में आ सकूँ। जैसे राजा ययाति सत्य के प्रभाव से स्वर्गलोक में लौट आए थे॥ 62॥
 
‘Therefore, Goddess! Please allow me to go to the forest and get the Swasti recitation done for our well-being, so that after the period of exile is over, I may return to your service again. Just like King Yayati had returned to heaven due to the influence of truth.॥ 62॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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