श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.21.58 
यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा
धर्मो यत: स्यात् तदुपक्रमेत।
द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके
कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जिस कार्य में धर्म आदि समस्त पुरुषार्थ सम्मिलित न हों, उसे नहीं करना चाहिए। जिससे धर्म की सिद्धि हो, उसे आरम्भ करना चाहिए। जो केवल पुण्यात्मा है, वह संसार में सबके द्वेष का पात्र बनता है और धर्म के विरुद्ध कार्य में अत्यन्त आसक्त होना प्रशंसा का नहीं, निन्दा का विषय है। 58॥
 
'The work which does not include all the efforts like religion etc., should not be done. One should start that which leads to accomplishment of religion. One who is only virtuous becomes the object of everyone's hatred in the world and being too attached to work against religion is not a matter of praise, but of condemnation. 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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