श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.21.56 
अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव
जानामि भक्तिं च पराक्रमं च।
मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य
मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदु:खम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! मैं जानता हूँ कि तुम सदैव मुझमें भक्ति रखते हो और तुम्हारा पराक्रम भी मुझसे छिपा नहीं है; फिर भी तुम मेरी बात पर ध्यान न देकर मुझे और मेरी माता को कष्ट दे रहे हो। मुझे इस प्रकार अत्यधिक कष्ट न दो ॥ 56॥
 
'Lakshmana! I know that you always have devotion towards me and how great is your valour is also not hidden from me; yet without paying heed to my intentions you are tormenting me along with my mother. Do not put me in extreme pain in this manner. ॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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