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श्लोक 2.21.53  |
किं जीवितेनेह विना त्वया मे
लोकेन वा किं स्वधयामृतेन।
श्रेयो मुहूर्तं तव संनिधानं
ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात्॥ ५३॥ |
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| अनुवाद |
| तुम्हारे बिना मुझे इस जीवन से क्या लाभ ? मुझे अपने बन्धुओं से, देवताओं और पितरों के पूजन से, यहाँ तक कि अमृत से भी क्या लाभ ? यदि तुम दो क्षण भी मेरे पास रहो, तो मुझे समस्त संसार के राज्य से भी अधिक सुख प्राप्त होगा ॥ 53॥ |
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| ‘Without you, what do I gain from this life? What do I need from my relatives, from worshipping the gods and forefathers, and even from Amrit (nectar)? If you stay with me for even two moments, that will give me more happiness than the entire kingdom of the world.'॥ 53॥ |
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