श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.21.50 
अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दु:खं हृदि निगृह्य च।
वनवासकृता बुद्धिर्मम धर्म्यानुवर्त्यताम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
‘माँ! अभिषेक की यह सामग्री ले जाकर रख दो। अपने मन के शोक को दबाओ और वनवास के विषय में मेरे धर्म का पालन करो - मुझे जाने की अनुमति दो।’॥50॥
 
‘Ma! Take these materials for the abhisheka and keep them aside. Suppress your sorrow within and follow my religious advice regarding exile – give me permission to go.’॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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