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श्लोक 2.21.50  |
अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दु:खं हृदि निगृह्य च।
वनवासकृता बुद्धिर्मम धर्म्यानुवर्त्यताम्॥ ५०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘माँ! अभिषेक की यह सामग्री ले जाकर रख दो। अपने मन के शोक को दबाओ और वनवास के विषय में मेरे धर्म का पालन करो - मुझे जाने की अनुमति दो।’॥50॥ |
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| ‘Ma! Take these materials for the abhisheka and keep them aside. Suppress your sorrow within and follow my religious advice regarding exile – give me permission to go.’॥ 50॥ |
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