श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.21.42 
संश्रुत्य च पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा।
न कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
'वीर! धर्म का आश्रय लेकर जीवनयापन करने वाले पुरुष को चाहिए कि वह अपने पिता, माता या ब्राह्मण की दी हुई प्रतिज्ञा के विरुद्ध न जाए ॥ 42॥
 
'Valiant! A man who lives by the shelter of Dharma should not go against the promise made by his father, mother or a Brahmin. ॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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