श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.21.40 
मम मातुर्महद् दु:खमतुलं शुभलक्षण।
अभिप्रायं न विज्ञाय सत्यस्य च शमस्य च॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
'शुभलक्ष्मणा! मेरी माता को जो अपार एवं अद्वितीय दुःख हो रहा है, उसका कारण यह है कि वे सत्य और संयम के विषय में मेरे अभिप्राय को नहीं समझ पा रही हैं।
 
'Shubhlakshmana! The immense and unique sorrow which my mother is going through is due to her not understanding my intentions regarding truth and restraint.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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