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श्लोक 2.21.4  |
नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्।
येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघव:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'मैं श्री रघुनाथजी में ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिसके कारण उन्हें राज्य से निकालकर वन में रहने को विवश किया जाए॥4॥ |
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| 'I do not see any such crime or fault of Sri Raghunathji due to which he should be expelled from the kingdom and forced to live in the forest.॥4॥ |
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