श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 21: लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  2.21.2-3 
न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्।
त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगत:॥ २॥
विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षित:।
नृप: किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमान: समन्मथ:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्री राम राज्य का धन त्यागकर वन में जाएँ। महाराज उस स्त्री की बातों में आ गए हैं, इसीलिए उनका स्वभाव बदल गया है। एक तो वे वृद्ध हैं, दूसरे वे सांसारिक भोगों के वश में हो गए हैं; अतः कामदेव के वश में हो चुके वे राजा कैकेयी जैसी स्त्री के उकसाने पर क्या नहीं कह सकते?॥ 2-3॥
 
‘Elder mother! I also do not like it that Shri Ram should abandon the kingdom's wealth and go to the forest. Maharaj has got influenced by the woman's words, that is why his nature has changed. Firstly, he is old, secondly, he has been controlled by worldly pleasures; hence, what cannot that king, who has been controlled by Kamadev, say at the instigation of a woman like Kaikeyi?॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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