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श्लोक 2.20.55  |
भृशमसुखममर्षिता तदा
बहु विललाप समीक्ष्य राघवम्।
व्यसनमुपनिशाम्य सा महत्
सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किंनरी॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| आने वाले महान दुःख को सहन न कर पाने और महान संकट का विचार करके, सत्य के ध्यान में मग्न अपने पुत्र श्री रघुनाथजी को देखकर माता कौसल्या अत्यन्त विलाप करने लगीं, मानो कोई किन्नरी अपने पुत्र को बंदी अवस्था में देखकर विलाप कर रही हो॥55॥ |
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| Being unable to bear the impending great sorrow, and contemplating the great crisis, looking at her son Sri Raghunathji who was engrossed in meditation on Truth, mother Kausalya then began to lament profusely as if a Kinnari was weeping on seeing her son in captivity. ॥ 55॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे विंश: सर्ग:॥ २०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥ |
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